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   Department of Hindi

  

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       आधुनिक हिंदी साहित्य में अभिव्यक्त कृषक विमर्श 

( दि.१४ मार्च,२०२०,शनिवार को प्रताप महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित एवं रूसा द्वारा वित्तपोषित एकदिवसीय कार्यशाला की रिपोर्ट ) 

 

             प्रताप महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा दि.१४ मार्च,२०२० को “आधुनिक हिंदी साहित्य में कृषक विमर्श” इस विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन संपन्न हुआ. यह कार्यशाला केवल प्रताप महा-  -विद्यालय के हिंदी विभाग के छात्रों एवं अन्य विभागों के हिंदी भाषा एवं साहित्य में रूचि रखनेवाले छात्रों के लिए आयोजित की गयी थी. राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) द्वारा विशेष रूप से वित्तपोषित इस कार्यशाला का  आयोजन छात्रों को कृषक जीवन की व्यथा,पीड़ा एवं समस्याओं से परिचित कराने के हेतु से किया गया था. क्योंकि अधिकाँश छात्र-छात्राएं कृषक परिवारों से संबद्ध है.कार्यशाला के प्रमुख दो अतिथि वक्ताओं में हिंदी के प्रसिद्ध ललित निबंधकार डॉ.श्रीराम परिहार,भूतपूर्व प्राचार्य,श्री नीलकंठेश्वर महाविद्यालय खंडवा,मध्यप्रदेश एवं डॉ.बापुराव देसाई,भूतपूर्व अध्यक्ष,तुलनात्मक भाषा एवं अध्ययन विभाग,उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय जलगाँव उपस्थित थे. उदघाटन सत्र का प्रारंभ विभाग की एम्.ए.प्रथम वर्ष की छात्राएं सविता,पूजा,निकिता आदि द्वारा मधुर स्वर में प्रस्तुत स्वागत गीत ‘हम सब भारतीय है’ से हुआ. उदघाटन सत्र की अध्यक्षता मा.प्राचार्या डॉ.ज्योति राणे ने की. उद्घाटन सत्र के प्रमुख अतिथि के रूप में खानदेश शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष श्री.कमल कोचर,सचिव डॉ.अरुण कोचर,विश्वस्त श्रीमती वसुंधरा लांडगे,उपप्राचार्य डॉ.मोमाया,डॉ.एस.ओ.माली,डॉ.डी.एन.वाघ. आदि उपस्थित थे.अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में मा.प्राचार्य डॉ.ज्योति राणे जी ने अंग्रेजी साहित्य में अभिव्यक्त कृषक जीवन के विभिन्न आयामों पर सारगर्भित कटाक्ष किया. कार्यशाला की प्रस्तावना हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.कुबेर कुमावत ने की. विशेष अतिथि डॉ.श्रीराम परिहार जी ने वर्तमान कृषक जीवन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला. उदघाटन सत्र का उत्तम संचालन डॉ.कल्पना पाटिल एवं कृतज्ञता ज्ञापन डॉ.शशिकांत सोनवणे ने किया.उदघाटन सत्र के समाप्ति के पश्चात तुरंत कार्यशाला के प्रथम सत्र का प्रारंभ हुआ.

                   कुल दो सत्रों में विभाजित इस कार्यशाला के प्रथम सत्र का विषय ‘आधुनिक हिंदी कविता में अभिव्यक्त कृषक विमर्श’ की अध्यक्षता उपप्राचार्य श्री.एस.ओ.माली ने की. इस सत्र के प्रमुख अतिथि वक्ता डॉ.श्रीराम परिहार ने आधुनिक हिंदी कविता में अभिव्यक्त कृषक चेतना एवं संवेदना पर अपने अभ्यासपूर्ण वक्तव्य में कहा कि सरदार पूर्णसिंह,माखनलाल चतुर्वेदी,लोककवि नागार्जुन,राष्ट्रकवि दिनकर,निराला की रचनाओं में विशेषरूप से किसान जीवन का चित्रण हुआ है.बच्चन की ‘खेत हरियाये तो मन हरियाये’ इस कविता का संदर्भ प्रस्तुत कर अन्य हिंदी कवियों द्वारा कृषक जीवन के विभिन्न आयामों का किस प्रकार चित्रण हुआ है इस पर आपने प्रकाश डाला.परिहार जी ने छात्रों से कहा कि अनुभूति आने के लिए अपने परिवेश को गहराई से देखने- समझने की क्षमता का विकास होना आवश्यक है. भारत देश में विमर्श नहीं होते,संवाद होता है. विमर्श यह विदेशी शब्द है. भारत में सन १८५७ से किसान आंदोलन होते आये हैं. १८५७ के तेलंगाना किसान आंदोलन  से इसका प्रारंभ होता है. सन १८८६ के बलिया कवि सम्मलेन में भारतेंदु ‘लेवी लेवी प्राण लेवी’ कहकर अंग्रेज सरकार द्वारा किसानों के शोषण की बात करते है.हमारे जीवन में कृषक संस्कृति का स्थान सबसे उंचा है. कोई विदेशी महिला गोल रोटी नहीं बना सकती जैसी मेरी माँ बनाती है. हमारे देश में माँ,बहन,पत्नी जैसी रोटी बनाकर हमें खिलाती है वैसे दुनिया के किसी देश में नहीं खिलायी जाती.आपने यह भी पीड़ा व्यक्त की कि वर्तमान हिंदी कविता में कृषक जीवन का जैसा चित्रण अपेक्षित है वैसा नहीं हो पा रहा है.

            कार्यशाला का दूसरा सत्र ‘आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में अभिव्यक्त कृषक विमर्श’ विषय पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता उपप्राचार्या प्रा.ललिता पाटिल ने की. विषय प्रवर्तन इस सत्र के वक्ता डॉ.बापुराव देसाई ने किया. अपने ओजपूर्ण वक्तव्य में डॉ.देसाई ने मुंशी प्रेमचंद,फणीश्वरनाथ ‘रेणु’,रामवृक्ष बेनीपुरी,नागार्जुन के कथा साहित्य में चित्रित कृषक जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विश्व की हर भाषा के साहित्य में कृषक जीवन का चित्रण मिलता है. अपने अहिराणी भाषा में लिखित “झोडग्या” इस उपन्यास की विषयवस्तु से भी छात्रों को अवगत कराया. आपने प्रसिद्ध सरकारी अधिवक्ता ऐड.उज्ज्वल निकम द्वारा इस कार्यशाला हेतु दी गयी शुभ-कामनाओं से सभी को अवगत कराया. दोनों सत्रों के संचालन में इस कार्यशाला के संयोजक क्रमशः डॉ.कल्पना पाटिल एवं डॉ.सावन की महत्वपूर्ण भूमिका रही.दोनों सत्रों का धन्यवाद ज्ञापन विभाग की छात्राएं क्रमशः कु.पूजा बाविस्कर एवं कु.गायत्री पाटिल ने किया. समापन सत्र में हिंदी विभाग अध्यक्ष डॉ.कुबेर कुमावत ने शिवमूर्ति के उपन्यास ‘आखरी छलाँग’,संजीव के उपन्यास ‘फांस’, पंकज सुबीर के ‘अकाल में उत्सव’ का संदर्भ देते हुए वर्तमान कृषक जीवन के चित्रण में भुमंडलीकरण,जमीन अधिग्रहण,प्राकृतिक प्रकोप,व्यापारी-बिचौलियों द्वारा किसानों का शोषण आदि पर अपना संक्षिप्त मत व्यक्त किया. समापन सत्र में धन्यवाद ज्ञापन डॉ.सावन ने किया. महाविद्यालय  के सी.सी.एम्.सी.विभाग के सभागार में आयोजित इस कार्यशाला में लगभग ८०-९० छात्र-छात्राओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. प्रातः ९ से १० बजे तक छात्र-छात्राओं का पंजीयन हुआ..इस कार्यशाला में सहभागिता सभी छात्रों के लिए नि:शुल्क होने के कारण अधिकांश छात्र सहभागी हुए. अंत में सभी छात्रों को सहभागिता प्रमाणपत्र प्रदान किये गए.कार्यशाला की सफलता हेतु कार्यालय अधीक्षक,लेखापाल,ग्रंथपाल, सी.सी.एम्.सी विभाग के एवं अन्य कर्मचारियों का विशेष योगदान रहा.

 

       संयोजक                         संयोजक                           हिंदी विभागाध्यक्ष

  (डॉ.कल्पना पाटिल)                (डॉ.शशिकांत सोनवणे)                     (डॉ.कुबेर कुमावत)